पुराने समय जो उपवास किए जाते थे उस समय सिर्फ फलाहार होता था लेकिन आज फलाहार अर्थ बदल कर फरियाल हो गया है। उपवास केवल दिखावा है। उपवास के दौरान हम रोजाना खूब तला-भुना, अच्छा घी-तेल वाले पकवान बनाकर आहार लेते हैं। अच्छे खासे फल-फ्रूट घर में खरीद कर रखते है। रोज दो टाइम खाने वाले भोजन से कई गुना ज्यादा कैलोरी वाला आहार हमारे उपवास के दिनों का होता है। फलाहार के नाम पर पूरी-कचौरी, गुलाब-जामुन हलवा, खीर, क्या-क्या नहीं खाया जाता उपवास में!
कहने को तो हम बात संकल्पों की करते है। हम लोगों यह भी कह देते हैं कि हमारा उपवास सिर्फ दूध और केले पर किया है। लेकिन असल में उसकी आड़ में मूँगफली, ककड़ी, आलू चिप्स, साबूदाने की खिचड़ी, दिन में 4-5 बार चाय वगैरा-वगैरा सबकुछ साथ-साथ चलता रहता है। इसका सीधा-सा अर्थ यही हुआ कि हम उपवास के नाम पर हम जमकर माल उड़ाते हैं, छककर माल सूतने से पीछे भी नहीं हटते।
ऐसा नहीं कि हमने उपवास किया है इसका मतलब सिर्फ दो टाइम चाय या दूध लेकर और बाकी समय निराहार रहकर उपवास कर रहे है। हमारा उपवास तो है लेकिन खाने का और वह भी भरपूर खाने का। उपवास के नाम पर अनेकों प्रकार के विभिन्न-विभिन्न पकवान बनाकर हम उपवास के व्रत को पूरा करते है।
वैसे तो हर धर्म में उपवास का प्रावधान अपने-अपने तरीके का रहा है। और उपवास को धार्मिक रस्म मानकर ही पूरा किया जाता है। उपवास का सही अर्थ दिन में एक बार फल का आहार लेना, एक आसन पर बैठकर एक ही समय में खाना ताकि बार-बार खाने में न आए, उपवास के हर दिन कोई एक अलग वस्तु का त्याग करना ऐसा ही कुछ होना चाहिए। लेकिन होता ऐसा नहीं और कुछ ही होता है। जब उपवास करने के दिन नजदीक आने लगते है तभी लोग घरों में अलग-अलग प्रकार की मिठाई, फलाहारी व्यंजन आदि बनाकर पहले से ही रख लेते है। और उपवास के दिनों में जो अलग-अलग व्यंजन बनेंगे सो अलग। ऐसे में उपवास का सही अर्थ क्या होता है यह समझना मुश्किल ही है।
दरअसल सैकड़ों सालों से चले आए धार्मिक रीतिरिवाजों को हम तोड़-मरोड़कर अब इस्तेमाल कर रहे हैं। जरूरत है उपवास शब्द को सही तरह से समझा जाए और उसके बाद ही उपवास के बंधन में बंधा जाए। उपवास का अर्थ संयम भी है। संयम का अर्थ है दिनभर की चाय या खान-पान पर संयम करना। ऐसा नहीं कि भूख नहीं लगी हो फिर भी मुँह चलाते रहने के लिए कुछ न कुछ खाते रहना।
अगर उपवास के नाम पर तरह-तरह के व्यंजन ही बनाकर खाना हो और तरह-तरह के फल ही खाना हो, दिन भर मुँह चलाना हो तो फिर उपवास करना ही बेकार है क्योंकि ये चीजे तो हम बिना उपवास किए भी खा सकते हैं। फिर उपवास के नाम को बदनाम करके त्योहारों का महत्व कम क्यों करें।
भगवान हमें यह नहीं कहते कि तुम्हें उपवास करना ही है। यह सब तो हमारी मर्जी से चलते है। फिर क्यों न उपवास को सही ढंग और सही नियम से किए जाए ताकि हमें सही अर्थ में उसका फल भी प्राप्त हो। वैज्ञानिक रूप से भी शरीर की शुद्धि के लिए व्रत का महत्त्व स्वीकार किया गया है । क्यों न व्रत को व्रत की तरह रखकर हम स्वयं का आत्मपरीक्षण करें। तभी तो हम धर्म और उसके त्याग का सही अर्थ समझकर उपवास की महिमा से गौरवान्वित हो पाएँगे। क्या आप भी इस बात से सहमत है।
उपवास के नाम पर बढ़ते खान-पान के चलन को आप किस तरह नियंत्रित करते हैं?
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