Webdunia: Portal - Search - Mail - Greetings   More >>
Support | Font Download | Feedback
Search  
Welcome, Guest  [ Register | Sign In ]

आचार्यश्री विद्यासागरजी का जन्म दिवस


सदी के प्रखर कवि, महाकवि, तपस्वी, अहिंसा, करुणा, दया के प्रणेता परम पूज्य राष्ट्रसं‍त शिरोमणि आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज का आश्विन शुक्ल पूर्णिमा (शरद पूर्णिमा) के दिन जन्म दिवस मनाया जाता है। उनका बचपन का नाम विद्याधरजी था।

बेलगाँव जिले के गाँव चिक्कोड़ी में शरद पूर्णिमा के दिन जन्मे संत के पिता मुनिश्री मल्लिसागरजी और माता आर्यिकाश्री समयमतिजी दोनों ही धार्मिक प्रवृत्ति के थे। उन्होंने कन्नड़ भाषा में नौवीं तक शिक्षा ग्रहण की। नौ वर्ष की उम्र में आचार्यश्री शांतिसागरजी महाराज के प्रवचन सुनकर विद्यासागरजी ने आध्यात्मिक मार्ग पर चलने का संकल्प कर लिया था। और फिर आचार्यश्री ज्ञानसागरजी महाराज के शिष्यत्व में उन्होंने मात्र 22 वर्ष की आयु में राजस्थान की ऐतिहासिक नगरी अजमेर में 30 जून, 1968 को दिगम्बर मुनि दीक्षा ग्रहण की।

विद्यासागरजी ने कन्नड़ भाषा में शिक्षण ग्रहण करने के बावजूद अँग्रेजी, हिन्दी, संस्कृत, कन्नड़ और बांग्ला भाषा में भी लेखन का कार्य किया। महाराजश्री द्वारा लिखित 'मूकमाटी' महाकाव्य सर्वाधिक चर्चित रहा है। उनके उपदेश, प्रवचन, प्रेरणा और आशीर्वाद से कई गौशालाएँ, स्वाध्याय शालाएँ, कई औषधालय कई स्थानों पर स्थापित किए गए हैं और अनेक जगहों पर निर्माण कार्य अभी जारी है। उनका अमरकंटक में 'सर्वोदय तीर्थ' के नाम से एक विकलांग निःशुल्क सहायता केंद्र चल रहा है। पशुदया के प्रणेता ने देश के विभिन्न राज्यों में गौशालाएँ स्थापित करके कत्लखाने जा रहे हजारों पशुओं संरक्षण ‍दिया है। आचार्यजी पशु मांस निर्यात निरोध के लिए जनजागरण अभियान भी चला रहे हैं।

मुनि ज्ञानसागरजी ने अपने शिष्य विद्यासागर को संस्कारित करके अपने आचार्य पद से विभूषित कर दिया और फिर आचार्यश्री विद्यासागरजी के निर्देशन में खुद ने समाधिमरण हेतु सल्लेखना ग्रहण कर ली।

इस वर्ष महाराजश्री विद्यासागरजी और उनके संघ का चातुर्मास अतिशय क्षेत्र रामटेक, नागपुर (महाराष्ट्र) में रहा है।

महाराजश्री ने गाय को राष्ट्रीय प्राणी
घोषित करने, मांस निर्यात बंद करने और पशु धन बचाने पर खास जोर दिया। ऐसे सौम्य छवि वाले कठोर साधक को सादर नमन्।
अस्वीकरण