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इन्विटेशन का दु:ख


अभी कुछ समय पहले की ही बात है। मेरे एक परिचित के यहाँ दुकान का मुहूर्त रखा गया था। जिनके यहाँ दुकान का मुहूर्त था। वह काफी संपन्न और पैसे वाले घर के लोग थे। पैसे के इस अहंकार के चलते वो गरीब इंसान को कचरा समझने लगे। जब मुहूर्त का दिन नजदीक आया तो उन्होंने अपने बड़े भाई के घर फोन लगाया।

और उन्हें इन्विटेशन का न्यौता दिया जो कुछ इस प्रकार था- 'घरवालों को पत्रिका नहीं दी जाती इसलिए मैं घर पत्रिका देने नहीं आ रहा हूँ। मैंने फोन लगा दिया है, फिर मत कहना कि मैंने बुलावा नहीं दिया! आना-नहीं आना ‍तुम्हारी मर्जी। बाद में मुझे ताना मत देना। वो तो मेरी पत्नी ने कहा कि घरवालों को पत्रिका नहीं दी जाती इसलिए फोन लगा दो तो मैंने लगा दिया। तुम देख लेना।'

इन्विटेशन भी दिया तो कैसा, जिसमें ना ही समय पता और ना ही खाने का बुलावा। आखिर ये कैसा इन्विटेशन।

बेचारे इन्विटेशन के परिवार वाले अब इस बात का दु:ख मना रहे है कि इतने बड़े लोगों के यहाँ जाए तो कैसे जाएँ।
अस्वीकरण