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वह कली





जब भी मैं उस
कली को देखती हूँ
तो मन ही मन
खुश होती हूँ कि
एक दिन यह
कली भी
खिलकर फूल बनेगी
पढ़ेगी-लिखेगी
और एक दिन
बहुत अच्छी बनेगी
बहुत सच्ची बनेगी।

देखकर उसको
झूम उठता है
मेरा दिल
और बस यही लगता
है कि अपनी पलकों से
दूर न होने दूँ कभी भी
उस कली को।

लेकिन समय के साथ
सबकुछ बदल जाता है
और जब वह कली फूल
बनकर जवाँ हो जाएगी
तब एक दिन फिर
फुर्र से उड़कर
चली जाएगी मेरी
आँखों से दूर।

लेकिन मन को
हमेशा सताता रहता है
एक डर की
क्या वह फूल बनी कली
जब अपने ससुराल जाएगी
तब उसके आँखों से
बहने वाले आँसू
मुझे ये खुशी दे पाएँगे
कि क्या वह ताउम्र
खुश रह पाएगी उस
घर में जहाँ वो
बसेरा करने गई है।

बस इसी खौफ से ही
मन काँपता रहता है मेरा
काश मासूम-सी
उस कली का
दर्द हर कोई समझे।

बस यही है
उम्मीद की वो
हमेशा खुश रहे
और पूरी जिंदगी
फूल बनकर ही
इठलाती रहे, गुनगुनाती रहे
वह कली....!


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