जीवन में हमेशा ही ऐसा होता है कि कुछ अच्छी चीजे दिल को सुख-सुकून देती है। और इस तरह के होने हादसे हमेशा ही पूरे देश-दुनिया और शहर-गाँव को अपनी दहशत के चपेट में लेते है। 26 नवंबर को हुए आतंकी हमले भी हम आज तक भी नहीं भूल पाएँ फिर वह मुंबई कैसे भूल पाएगी, जिसने करीब साठ घंटों तक आतंकियों का वह कहर सहा है। होटल ताज पर हाइजैक करके वहाँ पर इस तरह की तबाही मचाना जो कभी किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा ऐसा हादसा। जिसे अब पूरा एक साल होने को आ गया है। उस आतंकी हमले में मारे गए वे बेगुनाह लोग, जो इस कल्पना से बहुत दूर रहे होंगे कि अगले ही कुछ पलों में उनकी मौत होटल के अंदर उनका इंतजार कर रही है। जिन्हें ये भी पता नहीं था कि अगले ही पल उनके और उनके परिवारवालों के लिए तबाही की, दुख की एक ऐसी बाढ़ लेकर आएगा जो इस जीवन में फिर कभी नहीं भर सकती।
यह बात यहीं पर खत्म नहीं होती क्योंकि पुलिस वालों को तो शहीद का नाम दे दिया गया। लेकिन उन आतंकियों का क्या जिन्होंने अपनी भी जानें इस हमले के दौरान गँवाई। यहाँ सवाल यह नहीं है कि हमले में जिन अफसरों ने जान गँवाई वे बहुत ही अच्छे इंसान थे और जिन आतंकियों ने जाव गँवाई वे बहुत बुरे। कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना ही है कि जान चाहे कोई भी, किसी की भी गई हो, लेकिन नुकसान तो सभी का हुआ। इस हमले में शामिल या यूँ कहे कि किसी भी हमले में शामिल आतंकी के घरवालों का भी बहुत नुकसान हुआ। उस माँ ने अपना बेटा, उस पत्नी ने अपना पति खो दिया यानी उसने अपने जीवन का सबकुछ खो दिया। हो सकता है कि आतंकी हमले शामिल रहा बेटा उस माँ का इकलौता हो जिसकी उम्र 70 से पार गुजर रही हो,लेकिन ऐसे में उस बेटे कि चाहे जो भी मजबूरी रही हो लेकिन ये किसी भी हद तक सही नहीं....।
हमले के लिए इन मासूमों को तैयार करने वाले उन बड़े और पैसे से भरी जेबों के उन मालिकों के आगे एक गरीब इंसान की कोई बिसात नहीं होती और इसलिए जानों का सौदा करके ये सौदागर इस तरह के हमलों को अंजाम देकर दुनिया में तबाही मचाते है और अपने दादागिरी के बल पर हर किसी को नुकसान पहँचाने में सफल हो जाते है।
अंत में सिर्फ इतना ही कि... करीब साठ घंटों तक मुंबई ने और पूरे देश ने यह दुस्वप्न देखा था, लेकिन अब डर तो बस इस बात का है कि ये देश, यहाँ के लोग और खासकर राजनेता इस हादसे को किसी दुस्वप्न की तरह भुला न दें क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो फिर हम मज़बूर रहेंगे बार-बार ऐसे ही दुस्वप्न देखने के लिए। और तब फिर भारत पर अंग्रेजों की तरह ही राज करने वाला कोई दूसरा गुंडाराज आ जाएगा जिसे इस देश से बाहर खदेड़ना हमारे लिए बहुत मुश्किल हो जाएगा।
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