
(हाय-हाय ये मजबूरी) हाय-हाय रे यह महँगाईबढ़ती महँगाई ने तोड़ दी हैआम आदमी की कमर। ऐसे में कैसे जिएँ कैसे खाएँ, कैसे पिएँयही है आम आदमी की सोच। तेल महँगा, दालें महँगीऔर हुआ रोजमर्रा की जरूरतका सारा सामान महँगा। ऐसे में कैसे जिएँयह सोचना भी पड़ रहा है बहुत ...
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